Thursday, February 25, 2016

THE NATH SAMPRADAYA

THE " NATH SAMPRADAYA "

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जय श्री आदि नाथ जी -------------
------------------नाथ सम्प्रदाय -------------------
नाथ शब्द अति प्राचीन है ! अनेक अर्थों में इस का प्रयोग वैदिक काल से
होता रहा है ! नाथ शब्द नाथृ धातु से बना है ,जिसके याचना ,उपताप
,ऐश्वर्य ,आशीर्वाद आदि अर्थ है ! जिससे ऐश्वर्य ,आशीर्वाद कल्याण मिलता
है वह ,,नाथ ,, है ! नाथ शब्द का अर्थ -राजा ,प्रभु ,स्वामी ,ईश्वर
,ब्रह्म ,सनातन आदि भी है !
ऋग्वेद के दशम मण्डल के सूक्त 130 में ,, नाथ ,, के बारे में कहा गया है !
यह सृष्टि कहाँ से हुई ? इस तत्त्व को कौन जानता है ? किसके द्वारा हुई ?
क्यों हुई ? कब से हुई ? इत्यादि विषय के समाधान करता ब पथ दृष्टा नाथ ही
हैं ! इस प्रकार प्राचीनतम ग्रंथ ,ऋग्वेद ,में नाथ का प्रयोग सृष्टिकर्ता
,ज्ञाता तथा सृष्टि के निम्मित रुप में मिलता है ! ,अथर्ववेद , में भी ,
नाथ , एवं ,नाथित , शव्दो का प्रयोग मिलता है !
नाथ सम्प्रदाय के विश्वकोश ,गोरख सिद्धांत संघ्रह , में उद्धृत ,राजगुह्य
एवं शक्ति संगम तन्त्र ,ग्रंथों में नाथ शब्द की व्याख्या दी गई है !
राजगुह्य ,के अनुसार नाथ शब्द म,ना ,का अर्थ है है अनादि रुप और ,थ ,का
अर्थ स्थापित होना !
इस प्रकार नाथ सम्प्रदाय का स्पस्टार्थ वह अनादिधर्म है !जो भूबनत्रय की
स्थिति का कारण है ! श्री गोरख को इसी ,कारण से ,नाथ ,कहा जाता है !
शक्ति संगम तन्त्र ,के अनुसार ,ना , शब्द का अर्थ नाथ ब्रह्म जो मोक्ष
दान में दक्ष है ,उन का ज्ञान कराना है और ,थ ,का अर्थ है ज्ञान के
सामर्थ्य को स्थापित करने वाला !
चूंकि नाथ के आश्रयण से इस नाथ ब्रह्म का साक्षात्कार होता है ! और
अज्ञान की वृद्धि स्थगत होती है ! इसी कारण नाथ शब्द का व्यवहार किया
जाता है ! संस्कृत टीकाकार मुनिदत्त ने ,नाथ ,शब्द को ,सत्गुरु ,के अर्थ
में गृहण किया है ! गोरख वाणी , में सम्पादित रचनाओं में ,नाथ ,शब्द दो
शव्दो में ब्यबहुत है !
1- रचियता के रुप में
2- परम तत्त्व के रुप में
गोरख सिद्धान्त संग्रह , ग्रंथ के प्रथम श्लोक में सगुण और निर्गुण की
एकता को नाथ कहा है !
नेपाल के योगीराज नरहरि नाथ शास्त्री के अनुसार नाथ शब्द पद ईश्वर वाचक
एवं ब्रह्म वाचक है ! ईश्वर की विभूतिया जिस रुप में भी जगत में विद्यमान
है ,प्राय नाथ के नाम से प्रसिद्ध है ! जेसे -- आदिनाथ ,पशुपति नाथ
,गोरखनाथ ,मत्स्येन्द्रनाथ ,गण नाथ ,सोमनाथ ,नागनाथ ,वैद्यनाथ ,विश्व नाथ
,जगन नाथ ,रामनाथ ,द्वारकानाथ ,केदारनाथ ,बदरीनाथ ,अमर नाथ ,एकलिंग नाथ
,पन्डरिनाथ ,जालंधरनाथ ,धुरँगनाथ ,रतननाथ ,चंदननाथ ,कायानाथ आदि असंख्य
देवता हैं ! इनकी पावन स्मृति लेकर नाथ समाज नाथांत नाम रखता है ! ईश्वर
अंश जीव अविनाशी की भावना रखी जाती है ! नाथ सम्प्रदाय के सदस्य उपनाम जो
भी लगते हों किन्तु मूल आदि नाथ ,उदय नाथ ,सत्य नाथ ,संतोष नाथ ,अचल नाथ
,कन्थड़ नाथ ,चोरँगिनाथ ,मत्स्येन्द्रनाथ ,गोरखनाथ ,आदि नव नाथ चौरासी
सिद्ध तथा अनन्त कोटि सिद्धों को अपने आदर्श पूर्वजों के रुप में मानते
हैं ! मूल नव नाथों से चौरासी सिद्ध हुए हैं और चौरासी सिद्धों seसे
अनन्त कोट सिद्ध हुए हैं ! एक ही अभय पंथ के बारह पंथ के बारह पंथ तथा
अठारह पंथ हुए एक ही निरंजन गोत्र के अनेक गोत्र हुए ! अंत में सब एक ही
नाथ पंथ में लीन होते हैं ! सारी सृष्टि नाथ ब्रह्म से उत्पन्न हुई ! नाथ
ब्रह्म में स्थित होती है ! नाथ ब्रह्म में ही लीन होती है ! इस तत्त्व
को जानकर शान्त भाव से नाथ ब्रह्म की उपासना करनी चाहिए !